Monday, June 1, 2026

'RTI आवेदन कैसे करें?

RTI आवेदन कैसे करें?

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कुछ लोगों ने मुझ से पूछा कि यह बताएँ कि सूचना का अधिकार (RTI) के अंतर्गत आवेदन कैसे करें। इस आलेख के माध्यम से मैं सम्बंधित जानकारी आपको देने का प्रयास कर रहा हूँ। लोकतंत्र में नागरिकों को शासन की कार्यप्रणाली के बारे में जानकारी प्राप्त करने का अधिकार है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने वर्ष 2005 में सूचना का अधिकार अधिनियम (Right to Information Act, 2005) लागू किया। इस अधिनियम ने प्रत्येक भारतीय नागरिक को सरकारी विभागों, मंत्रालयों, सार्वजनिक उपक्रमों तथा अन्य लोक प्राधिकरणों से सूचना प्राप्त करने का कानूनी अधिकार प्रदान किया। सूचना का अधिकार (RTI) नागरिकों को सशक्त बनाने का एक प्रभावी माध्यम है। 


आज डिजिटल युग में RTI आवेदन केवल डाक द्वारा ही नहीं, बल्कि ऑनलाइन भी प्रस्तुत किया जा सकता है। आइए जानें कि RTI आवेदन कैसे लिखा जाए और ऑनलाइन कैसे जमा किया जाए।


RTI क्या है?


सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 नागरिकों को सरकारी अभिलेखों, दस्तावेजों, आदेशों, रिपोर्टों, नोटशीटों तथा अन्य उपलब्ध सूचनाओं तक पहुँच प्रदान करता है। इसका उद्देश्य शासन में पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ावा देना है।


RTI आवेदन लिखने से पहले ध्यान रखने योग्य बातें


RTI आवेदन तैयार करते समय हमें निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए - 


- सूचना स्पष्ट और संक्षिप्त रूप में माँगें।

- केवल उपलब्ध अभिलेखों और दस्तावेजों से संबंधित सूचना माँगें।

- प्रश्न पूछने के बजाय रिकॉर्ड, प्रतिलिपि, आदेश, पत्राचार आदि की जानकारी माँगना अधिक प्रभावी होता है।

- सूचना की अवधि (जैसे जनवरी 2024 से दिसंबर 2024 तक) स्पष्ट लिखें।

- एक आवेदन में सीमित और संबंधित विषयों की सूचना माँगें। 

- एक आवेदन में केवल एक विषय से संबंधित सूचना ही माँगें। एक आवेदन में एक से अधिक विषय शामिल न करें। 


RTI आवेदन कैसे लिखें?


RTI आवेदन के लिए सरकार द्वारा कोई निर्धारित प्रारूप अनिवार्य नहीं किया गया है। साधारण कागज पर भी आवेदन किया जा सकता है। ध्यान रखें कि आवेदन में निम्न जानकारी अवश्य शामिल होनी चाहिए - 


- जन सूचना अधिकारी (PIO) का नाम एवं कार्यालय, जिससे आपको सूचना प्राप्त करनी है। 

- आवेदक का नाम।

- आवेदक का पूरा डाक पता।

- आवेदक का मोबाइल नंबर अथवा ई-मेल (यदि उपलब्ध हो)।

- माँगी गई सूचना का स्पष्ट विवरण।

- आवेदन शुल्क का विवरण।

- दिनांक और आवेदक द्वारा हस्ताक्षर किए जाने चाहिए। 


RTI आवेदन का नमूना 


दिनांक: ___________________


सेवा में,


जन सूचना अधिकारी,

________________________ विभाग,

________________________ कार्यालय


विषय - सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के अंतर्गत सूचना प्राप्त करने हेतु आवेदन।


महोदय,


कृपया मुझे सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के अंतर्गत निम्नलिखित सूचनाएँ उपलब्ध कराने का कष्ट करें—


________________________________________________________________________


________________________________________________________________________


________________________________________________________________________


________________________________________________________________________



उक्त सूचना अवधि _______ से _______ तक की उपलब्ध कराई जाए।


आवेदन शुल्क नियमानुसार निम्न प्रकार जमा कराया गया है, जिसके विवरण निम्न है - ________________________ 

या 

मैं (आवेदक) गरीबी रेखा (BPL) के नीचे हूँ, अतः मुझे शुल्क देने से छूट है। सम्बंधित प्रमाणपत्र की स्व-प्रमाणित फोटोकॉपी संलग्न है। 


भवदीय,


हस्ताक्षर ______________


नाम ______________________


पता ______________________ 


मोबाइल  ___________________


ईमेल ______________________



RTI आवेदन शुल्क कितना होता है?


केंद्रीय सरकारी विभागों के लिए वर्तमान में RTI आवेदन शुल्क ₹10 है। गरीबी रेखा से नीचे (BPL) श्रेणी के आवेदकों को आवेदन शुल्क से छूट प्राप्त है। इसके लिए संबंधित प्रमाण-पत्र की प्रति संलग्न करनी होती है।


RTI आवेदन ऑफलाइन कैसे भेजें?


ऑफलाइन आवेदन निम्न माध्यमों में से किसी एक माध्यम से भेजा जा सकता है—


- स्पीड पोस्ट

- रजिस्टर्ड डाक

- व्यक्तिगत रूप से कार्यालय में जमा करके


आवेदन शुल्क सामान्यतः निम्न माध्यमों से जमा किया जा सकता है - 


- इंडियन पोस्टल ऑर्डर (IPO)

- डिमांड ड्राफ्ट (DD)

- बैंकर चेक (पेऑर्डर)

- नकद (जहाँ स्वीकार्य हो)


अधिकांश आवेदक ₹10 का इंडियन पोस्टल ऑर्डर संलग्न करना सुविधाजनक समझते हैं।


क्या RTI आवेदन ऑनलाइन किया जा सकता है?


हाँ। केंद्र सरकार के अनेक मंत्रालयों, विभागों तथा सार्वजनिक प्राधिकरणों के लिए RTI आवेदन ऑनलाइन प्रस्तुत किया जा सकता है। ऑनलाइन RTI प्रणाली के माध्यम से नागरिक घर बैठे आवेदन कर सकते हैं तथा आवेदन की स्थिति भी देख सकते हैं। 


ऑनलाइन RTI आवेदन कैसे करें?


ऑनलाइन RTI आवेदन करने के लिए निम्न चरण अपनाएँ - 


चरण 1 - RTI पोर्टल पर जाएँ।  केंद्रीय RTI ऑनलाइन पोर्टल खोलें। केंद्रीय सरकार के मंत्रालयों, विभागों और अनेक केंद्रीय सार्वजनिक प्राधिकरणों के लिए आधिकारिक RTI ऑनलाइन पोर्टल है - क्लिक करें https://rtionline.gov.in/ 


चरण 2 - "Submit Request" विकल्प चुनें।  निर्देशों को पढ़कर आगे बढ़ें।


चरण 3 - विभाग का चयन करें। जिस मंत्रालय, विभाग अथवा सार्वजनिक प्राधिकरण से सूचना चाहिए उसका चयन करें।


चरण 4 - आवेदक का विवरण भरें। नाम, पता, मोबाइल नंबर, ई-मेल आईडी आदि जानकारी दर्ज करें।


चरण 5 - सूचना का विवरण लिखें। जिस सूचना की आवश्यकता है उसे स्पष्ट और संक्षिप्त भाषा में लिखें।


चरण 6 - दस्तावेज अपलोड करें (यदि आवश्यक हो) संबंधित प्रमाण-पत्र या अन्य दस्तावेज अपलोड किए जा सकते हैं।


चरण 7 - आवेदन शुल्क जमा करें। ऑनलाइन भुगतान UPI, डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड, इंटरनेट बैंकिंग माध्यम से किया जा सकता है। 


चरण 8  - आवेदन जमा करें। भुगतान पूर्ण होने के बाद आवेदन जमा हो जाएगा और एक पंजीकरण संख्या (Registration Number) प्राप्त होगी।


ध्यान दें कि उपर्युक्त पोर्टल मुख्यतः केंद्रीय सरकारी विभागों के लिए है। कई राज्य सरकारों ने अपने अलग RTI पोर्टल विकसित किए हैं, जबकि कुछ राज्यों में अभी भी RTI आवेदन डाक या व्यक्तिगत रूप से जमा किए जाते हैं। इसलिए राज्य सरकार से संबंधित सूचना माँगने से पहले संबंधित राज्य के RTI पोर्टल या प्रक्रिया की जानकारी अवश्य प्राप्त कर लें।


ऑनलाइन RTI आवेदन के लाभ 


- घर बैठे आवेदन की सुविधा।

- डाक खर्च की आवश्यकता नहीं।

- आवेदन की स्थिति ऑनलाइन देख सकते हैं।

- भुगतान की डिजिटल सुविधा।

- समय और श्रम की बचत।


RTI का प्रभावी उपयोग कैसे करें?


RTI का उद्देश्य किसी व्यक्ति या अधिकारी को परेशान करना नहीं, बल्कि शासन में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना है। इसलिए सूचना माँगते समय तथ्यों, अभिलेखों और दस्तावेजों पर आधारित जानकारी ही माँगनी चाहिए।


निष्कर्ष


सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 भारतीय नागरिकों को सशक्त बनाने वाला एक महत्वपूर्ण कानून है। आज ऑनलाइन RTI सुविधा ने सूचना प्राप्त करने की प्रक्रिया को और अधिक सरल एवं सुविधाजनक बना दिया है। यदि नागरिक इस अधिकार का जिम्मेदारीपूर्वक उपयोग करें, तो शासन में पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और जनभागीदारी को और अधिक मजबूत बनाया जा सकता है। सूचना नागरिक का अधिकार है और पारदर्शिता सुशासन की पहचान। 


सादर, 

केशव राम सिंघल   



Sunday, October 12, 2025

सूचना का अधिकार दिवस

सूचना का अधिकार दिवस 

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प्रतीकात्मक चित्र साभार NightCafe 


12 अक्टूबर का दिन भारत में सूचना के अधिकार (Right to Information - RTI) के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। भारत में सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (Right to Information Act, 2005) को 12 अक्टूबर 2005 से पूरे देश में (जम्मू-कश्मीर को छोड़कर, जहाँ बाद में लागू हुआ) प्रभावी किया गया था। अर्थात् — 12 अक्टूबर 2005 को यह कानून कार्यान्वित हुआ, जिससे हर भारतीय नागरिक को सरकारी कार्यालयों और सार्वजनिक प्राधिकरणों से जानकारी प्राप्त करने का कानूनी अधिकार मिला। 12 अक्टूबर का यह दिन “सूचना का अधिकार दिवस” (RTI Day) के रूप में भी मनाया जाता है।


यह कानून नागरिकों को शासन में पारदर्शिता (transparency) और उत्तरदायित्व (accountability) सुनिश्चित करने का साधन देता है। यह लोकतंत्र को मज़बूत बनाता है और भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक प्रभावी उपकरण है। इसलिए, 12 अक्टूबर का दिन सूचना के अधिकार के इतिहास में एक मील का पत्थर (milestone) है — क्योंकि इसी दिन यह अधिकार भारतीय नागरिकों को व्यवहारिक रूप से प्राप्त हुआ।


सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI Act, 2005) ने शासन को जनता के प्रति उत्तरदायी और पारदर्शी बनाया है। इस कानून की वजह से आम नागरिक अब उन सूचनाओं तक पहुँच सकते हैं जो पहले केवल सरकारी दफ्तरों तक सीमित थीं।


इस कानून के तहत जनता सरकारी योजनाओं और धन के उपयोग की जानकारी प्राप्त करती है। कई गाँवों में नागरिकों ने सूचना का अधिकार दायर करके यह जानकारी प्राप्त की कि उनके क्षेत्र में विकास योजनाओं (जैसे प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, मनरेगा आदि) के लिए कितना धन स्वीकृत हुआ और वास्तव में कितना खर्च हुआ। अक्सर इसका परिणाम यह हुआ कि फर्जी बिलों और कागज़ी कार्यों के जरिए हुए भ्रष्टाचार का पर्दाफाश हुआ और प्रशासन को सुधारात्मक कार्रवाई करनी पड़ी।


इस कानून के कारण नियुक्तियों और पदोन्नतियों में पारदर्शिता सुनिश्चित हो सकी। कई मामलों में उम्मीदवारों ने सूचना का अधिकार के माध्यम से यह जानकारी पाई कि चयन प्रक्रियाओं में किस प्रकार अंक दिए गए या इंटरव्यू में किन मापदंडों का उपयोग हुआ। इससे भेदभाव और पक्षपात के बहुत से मामले सामने आए, जिससे चयन प्रक्रिया में सुधार हुआ।


इस कानून का उपयोग कर स्वास्थ्य और शिक्षा क्षेत्र में जवाबदेही सुनिश्चित की जा सकी। कुछ नागरिकों ने सूचना का अधिकार के ज़रिए यह जानकारी प्राप्त की कि उनके क्षेत्र के सरकारी अस्पतालों में कितनी दवाइयाँ खरीदी गईं और मरीजों को कितनी वितरित की गईं। इसका परिणाम यह रहा कि कई बार स्टॉक और वितरण में गड़बड़ियाँ सामने आईं, जिसके फलस्वरूप आगे जाँच और सुधारात्मक कार्रवाई हुई।


इस कानून की वजह से शहरी सेवाओं और नागरिक सुविधाओं में सुधार हुआ। कई बार नागरिकों ने RTI लगाकर स्थानीय प्रशासन (नगर निकाय) से यह पूछा कि उनकी कॉलोनी में सीवर लाइन या सड़क मरम्मत के लिए कब-कब बजट स्वीकृत हुआ और काम क्यों नहीं हुआ। परिणामस्वरूप नगर निकायों को जवाब देना पड़ा और जनहित के कार्यों की गति बढ़ी।


सरकार के उच्च स्तर पर भी जवाबदेही सुनिश्चित हुई। सूचना का अधिकार के माध्यम से प्रधानमंत्री कार्यालय, मुख्यमंत्री कार्यालय, विभिन्न मंत्रालयों और न्यायालय प्रशासन तक से भी आम नागरिकों ने जानकारी माँगी — जैसे फाइलों की स्थिति, निर्णय में विलंब के कारण या नीति निर्माण की प्रक्रिया। इससे शासन व्यवस्था में नीतिगत पारदर्शिता और नागरिक भागीदारी को बढ़ावा मिला।


सूचना का अधिकार अधिनियम ने शासन को “जनता से छिपाने वाले तंत्र” से बदलकर “जनता को जवाब देने वाले तंत्र” में परिवर्तित किया है। हालाँकि, चुनौतियाँ अभी भी हैं — जानकारी देने में देरी या टालमटोल, अधूरी सूचनाएँ प्रदान करना, और RTI कार्यकर्ताओं की सुरक्षा का अभाव। फिर भी, यह कहा जा सकता है कि सूचना का अधिकार अधिनियम ने शासन की पारदर्शिता को नई दिशा दी है और जनता को सशक्त बनाया है। सूचना का अधिकार नागरिक सशक्तिकरण का प्रतीक है, जो शासन को जनता के प्रति जवाबदेह बनाता है और लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत करता है।


सूचना का अधिकार दिवस पर हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ।


— केशव राम सिंघल 

 

 

Tuesday, October 12, 2021

Is Indian Banks’ Association (IBA) a public authority under the RTI Act, 2005?

 

Is Indian Banks’ Association (IBA) a public authority under the RTI Act, 2005?

 

When I opened IBA’s website, I find a Note for Information that includes the following:

 

“IBA wishes to clarify in this regard that IBA is:

-        - An association of banks and other entities in the banking ecosystem in India catering to its members;

-       -  Neither a Governmental entity nor a Regulatory Authority;

-        - Not amenable to Writ Jurisdiction of Courts; and

-        - Not subject to the RTI Act.”

 

The definition of ‘public authorities’ under the Right to Information Act, 2005 (“RTI Act”) has been an extremely contentious issue since the RTI came into force. The question of “who is a public authority?” is critical one because it sets the boundaries of the scope of the RTI Act specifically and the transparency regime in the country, more generally. In the last many years, a wide variety of entities otherwise considered to be private entities (such as schools, colleges and sports associations) have been declared public authorities, and have had to comply with the requirements of the RTI Act. A perusal of judgments of High Courts and the CIC reveals a diverse and at times, conflicting jurisprudence regarding the ambit of ‘public authorities’ under the RTI Act.

 

The term “public authority” is defined in Section 2(h) of the RTI Act. It states: “public authority” means any authority or body or institution of self- government established or constituted—

(a)    by or under the Constitution;

(b)    by any other law made by Parliament;

(c)     by any other law made by state legislature;

(d)    by notification issued or order made by the appropriate Government,

and includes any—

(i)                  body owned, controlled or substantially financed;

(ii)                non-Government organization substantially financed, directly or indirectly by funds provided by the appropriate Government;

 

The RTI Act thus defines public authorities in two parts. The first part of the definition (clauses 2(h)(a) to (d) clearly delineate bodies created by the Constitution of India (Union and state executives, Election Commission, etc.), by laws made by Parliament and state legislatures (Central and state universities, regulators such as RBI, SEBI, TRAI etc.), and by government orders or notifications (Planning Commission) as public authorities. The second part broadens the scope of the definition of a public authority to include anybody owned, controlled or substantially financed, and any non-governmental body substantially financed by the appropriate government. This second part of the definition has been the subject of much controversy largely because it leaves the question of what constitutes (a) ownership, (b) control or/and (c) substantial financing open to interpretation. Unsurprisingly therefore, most of the case law related to the question of public authorities is linked to this aspect of the definition.

 

IBA claims it is a voluntary association of member banks. It also claims that it is neither a governmental entity nor a regulatory authority, and it is not amenable to writ jurisdictions of courts and not subject to the Right to Information Act, 2005.

 

IBA is financed by its members including public sector banks. PSBs are its members and as per an estimate the major contribution of the IBA, more than 70 per cent, comes from PSBs. All along, IBA has been claiming that it does not come under the RTI Act. So far, the IBA has not designated any Central Public Information Officer (CPIO).

 

In the RK Jain versus Indian Banks’ Association case, the Central Information Commission considered whether the IBA comes under the RTI Act. The Central Information Commission, in its order dated 13 November 2017 stated: “Taking into account that the IBA performs functions as state agency and its majority control vests in Government of India-appointed Managing Directors of public sector banks, the IBA qualifies to be public authority under the RTI Act, 2005. The Commission, therefore, directed the IBA to designate an official of the IBA as the CPIO at the earliest as per provisions of section 5 of the RTI Act, 2005 and also to comply with section 4 of the RTI Act, 2005 within four weeks of the receipt of the Commission’s order.

 

Instead of appointing a CPIO, the IBA filed a writ petition before the Delhi High Court (WP No 11046/2017), and on 13 December 2017, the High Court stayed the CIC order. The case is yet to be decided and in the meanwhile the IBA is taking advantage of High Court stay.

 

KRS

 

Courtesy –

-  IBA website

- RTI Brief prepared by Anirudh Burman

- Why is Indian Banks' Association not under RTI, S. Kalyanasundaram, The Hindu Business Line

 

Sunday, September 27, 2020

सूचना लेने के लिए आवेदक का कार्यालय में जाना आवश्यक नहीं

सूचना लेने के लिए आवेदक का कार्यालय में जाना आवश्यक नहीं

 सामान्य रूप से आवेदक सूचना प्राप्त करने के लिए सूचना का अधिकार अधिनियम के अंतर्गत सूचना अधिकारी को अपना आवेदन भेजते हैं। अमूमन देखा गया है कि कुछ सूचना अधिकारी कोई छोटा-मोटा आक्षेप लगाकर या तो सूचना देने में आनाकानी करते हैं या फिर सूचना देने के लिए प्रार्थी को अपने कार्यालय बुलाते हैं।
इस सम्बन्ध में एक अपील निर्णय हमारी जानकारी में आया हैं जिसमें मुख्य सूचना आयुक्त ने निर्णय देकर सूचना अधिकारी को पाबन्द किया कि वह आदेश प्राप्ति के पंद्रह दिनों में जानकारी रजिस्टर्ड डाक से अपीलार्थी को भेज दे। माननीय एम डी कौरानी, मुख्य सूचना आयुक्त का निर्णय (पुरुषोत्तम पाराशर बनाम अधिशासी अधिकारी, नगर पालिका मंडल पुष्कर अपील संख्या 54 / 2009 निर्णय दिनांक 7-8-2009) महत्वपूर्ण है, जिसमे प्रत्यर्थी पक्ष का कथन था कि सारी सूचना उनके पास तैयार है परन्तु अपीलार्थी अनुरोध करने के उपरान्त भी लेने के लिए नहीं आये। माननीय महोदय ने निर्णय में लिखा कि सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के अंतर्गत यह अनिवार्य नहीं कि सूचना लेने के लिए कोई व्यक्ति अनिवार्य रूप से कार्यालय में आकर प्राप्त करे। यदि प्रत्यर्थी पक्ष ने छायाप्रतियां तैयार कर ली हैं तो अब उन्हें इस आदेश की प्राप्ति के पंद्रह दिवस में उन प्रतियों को रजिस्टर्ड डाक से अपीलार्थी को प्रस्तुत कर देनी चाहिए।
इस प्रकार यह स्पष्ट हुआ है कि सूचना लेने के लिए आवेदक का कार्यालय में जाना आवश्यक नहीं है। 

(साभार - आरटीआई एक्टीविस्ट देवेंद्र सक्सेना, वैशाली नगर, अजमेर, जिनसे यह महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त हुई।)

शुभकामनाओं सहित, 

 केशव राम सिंघल

Tuesday, December 17, 2019

सुप्रीम कोर्ट ने आरटीआई के दुरूपयोग को रोकने के लिए गाइडलाइन बनाने का अनुमोदन किया


सुप्रीम कोर्ट ने आरटीआई के दुरूपयोग को रोकने के लिए गाइडलाइन बनाने का अनुमोदन किया
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सुप्रीम कोर्ट ने सूचना का अधिकार अधिनियम का दुरूपयोग रोकने के लिए गाइडलाइन बनाने का अनुमोदन कर दिया है, ताकि निहित स्वार्थ वाले व्यक्ति ब्लैकमेल करने और डराने-धमकाने के लिए इस अधिनियम का सहारा न ले पाएं। मुख्य न्यायाधीश एस ए बोबड़े की अध्यक्षता वाली बैंच, जिसमें न्यायाधीश बी आर गवई और न्यायाधीश सूर्यकांत भी शामिल हैं, कि कुछ लोग किसी भी मुद्दे को लेकर आरटीआई ऍप्लिकेशन फाइल कर देते हैं, जबकि ऐसे लोगों का उस मुद्दे से कोइ लेना-देना नहीं होता है। कभी-कभी तो यह प्रवृति आपराधिक धमकी का रूप ले लेती है। बैंच ने कहा कि हम आरटीआई के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन गाइडलाइन की जरुरत तो है। यह एक स्वेच्छाचारी अधिकार नहीं हो सकता।



अदालत ने कहा कि इस कानून का उद्देश्य प्रशंसनीय है, लेकिन ऐसे भी उदाहरण हैं, जहाँ लोग इस कानून का दुरुपयोग करते हैं। मुम्बई में ऐसी बहुत सी घटनाएं हुईं, जिसमें आवेदकों ने कानून की प्रावधानों का दुरूपयोग कर व्यावसायिक और व्यापारिक अनुबंधों के निर्णयों से समबन्धित सूचनाएं माँगी थी। एडवोकेट प्रशांत भूषण ने एक ओर इस बात पर अपनी सहमति दिखलाई कि ऐसे प्रकरण हो सकते हैं, साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि सत्ता के गलियारों की बहुत सी निंदनीय जानकारियाँ आरटीआई के माध्यम से ही सामने आ सकी हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि चुनावी बॉन्ड्स से जुड़ा मुद्दा आरटीआई के माध्यम से ही सामने आ सका।

मुख्य न्यायाधीश बोबड़े आरटीआई कानून का दुरूपयोग रोकने के लिए इसकी गाइडलाइन जारी करने की जरुरत पर जोर देते हुए आश्चर्य व्यक्त करते हुए पूछा कि ये आरटीआई कार्यकर्ता होने का दावा करने वाले कौन लोग हैं, क्या यह एक पेशा है?



एडिशनल सॉलिसिटर जनरल पिंकी आनंद ने कहा कि आरटीआई के गलत उपयोग का मामला गंभीर चिंता का विषय है। उन्होंने कोर्ट को सूचित किया कि 14 दिसंबर 2019 को एक सर्च कमेटी का गठन किया गया है जो केंद्रीय सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों के पदों पर नियुक्ति करने के लिए उम्मीदवारों के नामों की सूची तैयार करेगी और उनके नाम सरकारी वेबसाइट पर डाले जाएंगे। कोर्ट ने इस बयान को रिकॉर्ड में लिया।

कोर्ट ने केंद्र और राज्य को सीआईसी और एसआईसी में रिक्त सभी पदों को तीन माह में भरने का समय दिया और याचिकाकर्ता अंजलि भारद्वाज और उनके वकील प्रशांत भूषण को इस बात की अनुमति प्रदान कर दी कि वे कोर्ट द्वारा 15 फरवरी 2019 को जारी पांच दिशानिर्देशों की पालना नहीं करने वाले राज्यों व् केंद्र सरकार के खिलाफ अवमानना याचिका दाखिल का सकते हैं।

(साभार स्रोत - राष्ट्रदूत, 17 दिसंबर 2019 में प्रकाशित समाचार)

Friday, November 22, 2019

मजदूर किसान शक्ति संगठन (MKSS) द्वारा सूचना के अधिकार पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का स्वागत


मजदूर किसान शक्ति संगठन (MKSS) द्वारा सूचना के अधिकार पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का स्वागत

मजदूर किसान शक्ति संगठन सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का स्वागत करता है जो सर्वोच्च न्यायालय के केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी (CPIO) बनाम सुभाष चन्द्र अग्रवाल के बीच था और जो सूचना के अधिकार की तीन प्रमुख अपील को लेकर आया था, जिसने - सूचना का अधिकार कानून का भारत के मुख्य न्यायाधीश व सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) पर लागू होता है - वाले सवाल का हल किया। फैसले ने यह भी स्पष्ट किया कि सूचना के अधिकार के तहत कुछ निश्चित जानकारी प्रदान करने से न्यायपालिका की स्वतंत्रता या विश्वसनीयता नष्ट नहीं होगी।

यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) एक संवैधानिक न्यायालय के रूप में, सुप्रीम कोर्ट एक प्रशासनिक कार्यालय (इस मामले में अपीलकर्ता) के रूप में सुप्रीम कोर्ट से भिन्न था और सर्वसम्मति से यह घोषित किया गया था कि भारत के संविधान द्वारा स्थापित सुप्रीम कोर्ट और भारत के मुख्य न्यायाधीश एक ही सार्वजनिक प्राधिकरण का हिस्सा थे, इसलिए सामूहिक रूप से सूचना के अधिकार अधिनियम (आरटीआई अधिनियम 2005) के तहत "सार्वजनिक प्राधिकरण" के दायरे में आते थे।

यह निर्णय लेते हुए कि दस्तावेजों के सभी तीन वर्ग- “नियुक्तियों का मामला", "संपत्ति का मामला" और "अनुचित प्रभाव का मामला", वास्तव में सूचना के अधिकार के दायरे में होगा, सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायिक स्वतंत्रता को अधिक पारदर्शिता और जवाबदेही के लिए सुधारों के साथ नहीं देखा जाना चाहिए। फैसले में न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि "न्यायिक स्वतंत्रता का मतलब यह नहीं समझा जाना चाहिए कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता केवल सूचना से इनकार करके प्राप्त की जा सकती है"। वास्तव में न्यायालय ने कहा कि "किसी दिए गए मामले में स्वतंत्रता अच्छी तरह से सूचना प्रस्तुत करके पारदर्शिता की मांग कर सकती है"। यह दर्शाता है कि पारदर्शिता और स्वतंत्रता के बीच एक सह क्रियात्मक प्रभाव हो सकता है, सुप्रीम कोर्ट ने सभी सार्वजनिक प्राधिकरणों को इसके दायरे में लाने का मार्ग प्रशस्त किया है, जिसमें एक संवैधानिक लोकतंत्र के लिए स्वतंत्र संस्थानों के साथ-साथ पारदर्शिता के मानक भी शामिल हैं। यह कहते हुए न्यायिक स्वतंत्रता का उपयोग मनमाने व्यवहार, या गोपनीयता के लिए एक ढाल के रूप में नहीं किया जा सकता है, यह निर्णय स्वतंत्र संस्थानों की विश्वसनीयता बढ़ाने के लिए उन्हें पारदर्शी बनाने का मार्ग प्रशस्त करता है, और इस तरह उनकी स्वतंत्रता की रक्षा करता है।

सर्वोच्च न्यायालय नागरिकों के दो मौलिक अधिकारों - सूचना का अधिकार और निजता के अधिकार के बीच नाजुक संतुलन पर कायम रहा। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अगर दोनों के बीच कोई विवाद होता है, तो सार्वजनिक हित इनके बीच में निर्धारक तत्व होगा। न्यायालय ने कहा कि यह संतुलन सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 8 (1) ञ के तहत अच्छी तरह से स्थापित किया गया था। इसलिए दोनों अधिकारों को सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के प्रावधानों के तहत संरक्षित किया जाएगा।

मजदूर किसान शक्ति संगठन (MKSS) का मानना है कि सूचना का अधिकार (RTI) और निजता का अधिकार (RTP) भारतीय संविधान से निकलने वाले मौलिक अधिकार हैं और राज्य का दायित्व है कि वह दोनों अधिकारों की रक्षा करे और उन्हें बढ़ावा दे। इस सवाल को सुलझाने के लिए, सर्वोच्च न्यायालय का फैसला निजता पर जस्टिस एपी शाह की रिपोर्ट (2012) की सिफारिशों के अनुरूप है, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि “सूचना का अधिकार अधिनियम द्वारा आवश्यक जानकारी का प्रकटीकरण निजता का उल्लंघन नहीं होना चाहिए।”.

मजदूर किसान शक्ति संगठन (MKSS) का मानना है कि लोकतान्त्रिक ढांचे में नागरिक आधारित जवाबदेही की व्यवस्था बनाने के लिए पारदर्शिता की बहुत आवश्यकता है। ग्रामीण मजदूरों की एक निरंतर और नैतिक लड़ाई जो उनके सार्वजनिक कार्यों में भरे गए मस्टर रोल और वाउचर के विवरणों को जानने के अपने अधिकार के साथ शुरू हुई, जो उनको न्यूनतम मजदूरी दिए जाने का दावा करते हुए, जनहित के हर क्षेत्र में पारदर्शिता के लिए एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन खड़ा किया गया। इसने 2005 में सूचना का अधिकार अधिनियम और शासन की खुली व्यवस्था का ऐतिहासिक मार्ग प्रशस्त किया। आरटीआई ने अपनी स्वतंत्रता और इसकी शक्ति को कम करने के लिए लगातार सरकारों द्वारा किए गए प्रयासों के साथ एक लंबी और कठिन यात्रा की है। राशन, पेंशन, दवाइयां, शिक्षा, रोजगार जैसी बुनियादी सेवाओं के वितरण से संबंधित मुद्दों को लेकर, हर साल 40 लाख से 60 लाख आरटीआई दायर की जाती हैं; संवैधानिक नियुक्तियों, बहुत सारे अनुबंधों का किया जाना, नीतिगत निर्णयों पर विचार-विमर्श, अल्पसंख्यकों पर हमले, कई अन्य लोगों के बीच भ्रष्टाचार घोटालों ने प्रदर्शित किया कि यह अनुच्छेद 19 (1) के साथ-साथ अनुच्छेद 21 (जीने का अधिकार) के तहत एक मौलिक अधिकार कैसे था और अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) भी। इसने आम नागरिकों को सूचना का अधिकार अधिनियम का उपयोग करने में, जांच- पड़ताल करने, सवाल करने और सत्ता के मनमाने और गैर जिम्मेदाराना उपयोग को उजागर करने में अटूट विश्वास भी दिखाया है। लगभग 80 आरटीआई कार्यकर्ताओं की मौत, जो सत्ता की साथ-गाँठ को उजागर करने के लिए आरटीआई का इस्तेमाल कर रहे थे, इस बात का प्रमाण है।

यह निर्णय ऐसे समय में आया है जब वर्तमान सरकार सूचना आयोगों की स्वतंत्रता से समझौता करके सूचना के अधिकार को कमजोर करने का प्रयास की है। संस्थानों की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए पारदर्शिता की आवश्यकता के सिद्धांतों के विपरीत, आरटीआई कानून में संशोधन पूरी गोपनीयता के साथ किए गए थे और केंद्र सरकार की विधायी पूर्व परामर्श नीति का उल्लंघन किया गया था, जो कानूनों के मसौदों को सार्वजनिक किये जाने और परामर्श को अनिवार्य बनाता है। हाल में किये गए संशोधन के अनुसार आयोगों के कामकाज को कार्यपालिका ( मंत्रिमंडल व मंत्रिपरिषद) द्वारा नियंत्रित किये जाने और संशोधन के अनुसार जारी किए गए नियमों द्वारा सरकार ने सूचना तक पहुंच के दावों पर निर्णय लेने के लिए अंतिम प्राधिकरण के रूप में कार्य करने की उनकी क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है, जो इस निर्णय ने स्पष्ट किया है कि यह भारतीय संविधान के तहत एक मौलिक अधिकार है। यह संघवाद के महत्वपूर्ण मुद्दे को भी उठाता है, और वर्तमान सरकार के केंद्रीकृत और अलोकतांत्रिक निर्णय लेने का एक सतत संकेत है। दिलचस्प बात यह है कि एक अलग फैसले में उसी दिन रोजर मैथ्यू बनाम साउथ इंडियन बैंक लिमिटेड एवं अन्य (2019) सर्वोच्च न्यायालय ने ट्रिब्यूनल के सदस्यों की नियुक्ति नियमों और शर्तों को इस आधार पर समाप्त कर दिया है कि कार्यपालिका ने एक स्वतंत्र निकाय के साथ हस्तक्षेप करने की अनुमति दी है, संभावित रूप से सूचना आयोगों की स्वतंत्रता को कमजोर करने के लिए सरकार के संशोधन के खिलाफ इसी तरह के निर्णय मार्ग प्रशस्त करते हैं।

मजदूर किसान शक्ति संगठन (MKSS) जनहित के मुद्दों पर इन महत्वपूर्ण आरटीआई आवेदनों को दाखिल करने और लगातार पीछा करने के लिए श्री सुभाष अग्रवाल और श्री प्रशांत भूषण को जिन्होंने एक दशक से अधिक समय तक कानून की विभिन्न अदालतों में इन पारदर्शी प्रावधानों के लिए दृढ़ और निडर होकर लड़ाई लड़ी को बधाई देता है। MKSS को उम्मीद है कि यह निर्णय अन्य सार्वजनिक प्राधिकरणों के लिए पारदर्शी तरीके से कार्य करने के लिए एक मिशाल बनेगा, ताकि स्वतंत्र संवैधानिक संस्थानों सहित सभी सार्वजनिक प्राधिकरण लोगों के प्रति जवाबदेह बनें। आरटीआई कानून लोकतांत्रिक अधिकारों की जड़ है, जो अन्य अधिकारों को प्राप्त किये जाने का मार्ग प्रशस्त करता है। MKSS लोगों के अधिकारों के लिए हमेशा प्रयास करता रहेगा, शासन के सर्वोत्तम हित और एक सहभागी लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए आरटीआई कानून 2005 के दायरे में वृद्धि करता रहेगा।

साभार स्रोत - मजदूर किसान शक्ति संगठन (MKSS) की प्रेस विज्ञप्ति

Wednesday, November 13, 2019

Offices of the Chief Justice of India and High Court Chief Justices are now under RTI


Offices of the Chief Justice of India and High Court Chief Justices are now under RTI

The Supreme Court on Wednesday, 13 November 2019, declared office of the Chief Justice of India and high court chief justices as 'public authority', making them liable to provide information to queries under the Right to Information Act, but weaved in caveats of 'judicial independence, privacy and genuine public interest' to protect judges and judiciary against witch-hunting.

- Keshav Ram Singhal

Saturday, July 27, 2019

सूचना का अधिकार संशोधन विधेयक 2019 संसद में पारित


सूचना का अधिकार संशोधन विधेयक 2019 संसद में पारित

लोकसभा में सोमवार दिनांक 22 जुलाई 2019 को सूचना का अधिकार संशोधन विधेयक 2019 विपक्ष के विरोध के वावजूद ध्वनि मत से पारित कर दिया गया। 25 जुलाई 2019 को यह विधेयक राज्यसभा में भी पारित हो गया है। हालांकि विपक्ष की मांग थी कि इस विधेयक को सलेक्ट कमेटी को भेजा जाए, पर सरकार ने इसे माना नहीं। तृणमूल कांग्रेस के डेरैक ओ'ब्रायन ने भी इस विधेयक के लिए संशोधन प्रस्ताव रखा कि विधेयक को संवीक्षा के लिए सलेक्ट कमेटी को भेजा जाए, पर इस संशोधन प्रस्ताव के पक्ष में 75 और विपक्ष में 117 वोट पड़े, अतः यह संशोधन प्रस्ताव पारित नहीं हो सका।

इस संशोधन विधेयक के द्वारा सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 13, 16 और 27 में संशोधन किया गया है। इन धाराओं के प्रावधानों का सम्बन्ध मुख्य सूचना आयुक्त और सुचना आयुक्त के कार्यकाल से सम्बंधित है, जिसके अनुसार सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के अंतर्गत इनका कार्यकाल पांच वर्ष के लिए निश्चित किया गया था और इनकी नियुक्ति केंद्र और राज्यों में की जाने की व्यवस्था थी। संशोधन अधिनियम के अंतर्गत अब केंद्र सरकार तय करेगी कि इनके कार्यकाल की सीमा क्या होगी।

सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 में यह व्यवस्था थी कि मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्त का वेतन और पद की स्थिति को मुख्य निर्वाचन आयुक्त और चुनाव आयुक्त के समान रखा गया था, जबकि संशोधन अधिनियम के अनुसार मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्त का वेतन और उनकी सेवा शर्तें केंद्र सरकार तय करेगी।

सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 का धारा 13 और 16 के तहत केंद्रीय सूचना आयुक्तों (CIC) को चुनाव आयोग का दर्जा और राज्य सूचना आयुक्तों को प्रमुख सचिव का दर्जा दिया गया था, ताकि वे स्वतंत्र और प्रभावी तरीके से कार्य कर सकें। जाहिर है सूचना का अधिकार अधिनियम में संशोधन के बाद सूचना आयोग की स्वतंत्रता खत्म हो जाएगी। विपक्षी दलों का तर्क है कि इस संशोधन विधेयक से पारदर्शिता कानून को कमजोर करेगी और सूचना आयोग की आजादी बाधित होगी। विपक्ष चाहता है कि इससे पहले कि बिल को राज्यसभा में पेश किया जाए, इस पर चर्चा की जाए और एक संसदीय समिति द्वारा इसकी छानबीन की जाए। विपक्ष का आरोप है कि केंद्र सरकार व्यक्ति-से-व्यक्ति (पर्सन-टू-पर्सन) मामले को देखते हुए उनके वेतन भत्ते, कार्यकाल और सेवा शर्तें तय करेगी। इससे सूचना का अधिकार कानून की मूल भावना से खिलवाड़ होगा।

संशोधन विधेयक लोकसभा और राज्यसभा में पारित हो गया है, अब इसे राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेजा जाएगा, तत्पश्चात यह अधिनियम के रूप में कानूनी रूप से लागू हो जाएगा।

- केशव राम सिंघल

Tuesday, May 1, 2018

भीम (राजसमंद) में आयोजित मजदूर मेले में हुआ ‘RTI कैसे आई’ पुस्तक का हुआ लोकार्पण


*भीम (राजसमंद) में आयोजित मजदूर मेले में हुआ ‘RTI कैसे आई’ पुस्तक का हुआ लोकार्पण*


भीम, राजसमंद, राजस्थान
01 मई 2018

राजसमंद ज़िले के भीम के पाटियाँ का चौड़ा में हर वर्ष की भाँति एक मई को अंतरराष्ट्रीय मज़दूर दिवस पर मज़दूर मेला आयोजित किया गया। मेले में देश के विभिन्न भागों से आए लोगों ने मज़दूरों के प्रति अपनी एकजुटता प्रकट की। देश में एक सशक्त जवाबदेही क़ानून बनाया जाए, नरेगा को सुचारू रूप से चलाने, न्यूनतम मज़दूरी को उचित दर से बढ़ाने, राशन से ग़रीबों के काटे गये नामों को पुनः जोड़ने व खाद्य सुरक्षा क़ानून के तहत पारदर्शिता लाने सहित अन्य कई प्रस्ताव भी इस अवसर पर लिए गए। साथ ही ‘RTI कैसे आई’ पुस्तक का लोकार्पण हुआ और जनता की ओर से एक जन घोषणा-पत्र आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए जारी किया गया।



उल्लेखनीय है कि एक मई 1990 से लगातार ग़रीब, किसान एवं मज़दूर राजसमंद ज़िले के भीम में मज़दूर मेले का आयोजन करते आ रहे हैं। इस साल इस मेले को 28 साल पूर्ण हुए हैं। संगठन के नारायण सिंह ने बताया कि इस बार इस मेले की ख़ासियत रही कि पिछले दो दिन से भीम क्षेत्र की महिलाओं ने इस आयोजन की कमान सम्भाली। 30 अप्रैल की मोटर-साइकल रैली के बाद आज बड़ी संख्या में महिलाओं ने मेले में भागीदारी निभाते हुए शराब-बंदी के लिए एकजुटता दिखाई। वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता लाल सिंह ने बताया कि मेले में भीलवाड़ा व राजसमंद ज़िलों से आए सिलिकोसिस पीड़ितों ने भी हिस्सा लिया उन्होंने कहा कि प्रशासन ने सिलिकोसिस होने के प्रमाण-पत्र तो इन्हें दे दिए पर इलाज के लिए राशि अभी तक नहीं दी।

‘RTI कैसे आई’ पुस्तक का हुआ लोकार्पण

पूर्व प्रशासनिक अधिकारी व प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा रॉय एवं मज़दूर किसान शक्ति संगठन के साथियों द्वारा लिखी गयी पुस्तक ‘RTI कैसे आई!’ का लोकार्पण मेले में हुआ। यह पुस्तक पूर्व में अंगरेजी में लिखी गयी थी, जिसका प्रकाशन रोली बुक्स ने किया था। इस पुस्तक का हिंदी अनुवाद अभिषेक श्रीवास्तव ने किया, जिसे राजकमल प्रकाशन के उपक्रम 'सार्थक' ने प्रकाशित किया है। इस पुस्तक की प्रस्तावना गोपालकृष्ण गांधी ने लिखी। पुस्तक के लोकार्पण के अवसर पर अरुणा रॉय ने कहा कि इस इलाक़े के लोगों ने सूचना के अधिकार आंदोलन की शुरुआत कई वर्षों पूर्व की। उन्होंने कहा कि ब्यावर में सूचना के अधिकार पर 1996 में 44 दिन का जो धरना दिया गया उस धरने के बाद ही सूचना का अधिकार एक राष्ट्र-व्यापी आंदोलन बना। यह पुस्तक RTI आंदोलन के इतिहास की ज़मीनी कहानी पर आधारित है। उन्होंने यह भी कहा कि देश में जो लोगों को बाँटने की राजनीति की जा रही है उसे हमें नकारना होगा और तोड़ने की बजाय हमें समाज को जोड़ना होगा। इस आंदोलन से जुड़े हुए कई संघर्ष-शील कार्यकर्ताओं ने इस पुस्तक की प्रशंसा करते हुए आंदोलन के वक़्त बिताए हुए अपने अनुभवों को साझा किया।



निखिल डे ने कहा कि यह हमारे लिए गर्व की बात है कि इस पुस्तक में हमारे आंदोलन और संघर्ष के इतिहास को लिखा गया है। हमारे इस आंदोलन की वजह से ही सूचना के अधिकार जैसा क़ानून पास हुआ। इस क़ानून से ना केवल देश को बल्कि आम जन को भी फ़ायदा हुआ है और जनता को अपने हक़ों से सम्बंधित सवाल सरकारों से पूछने की ताक़त मिली है। वरिष्ठ महिला कार्यकर्ता एवं सूचना के अधिकार आंदोलन से जुड़ी सुशीला बाई ने कहा कि आंदोलन के वक़्त हमें कहा जाता था कि ये घाघरा पलटन औरतें क्या कर लेंगी लेकिन हम जैसी घाघरा पलटन औरतें ही संघर्ष के बल पर देश में सूचना का अधिकार व रोज़गार गारंटी क़ानून ले आई। स्वतंत्र पत्रकार व दलित नेता भँवर मेघवंशी ने कहा कि ऐसा पहली बार हुआ है कि जनता के संघर्ष के बलबूते कोई क़ानून आया और आज उस क़ानून से जुड़ी इस क़िताब का जनता के बीच में ही लोकार्पण किया जा रहा है जो हर्ष की बात है। वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता बालूलाल ने कहा कि सूचना के अधिकार आंदोलन ने भ्रष्टाचार को रोकने में अहम भूमिका निभाई है और ये क़िताब निश्चित रूप से आने वाली पीढ़ी को प्रेरणा देगी। । इस अवसर पर कविता श्रीवास्तव और अजमेर के साथी डी. एल. त्रिपाठी ने भी सूचना के अधिकार से सम्बंधित जन-आंदोलन से जुड़े अपने स्मरणों को साझा किया।

इस अवसर पर पी.यू.सी.एल. अजमेर के डी.एल. त्रिपाठी, ओ.पी. रे, राधाबल्लभ शर्मा, रेणु मेघवंशी, केशव राम सिंघल आदि भी उपस्थित थे।



(संकलित)

Saturday, April 7, 2018

सूचना के अधिकार के जन आंदोलन की कहानी 'The RTI Story: Power to the People' पुस्तक का विमोचन


सूचना के अधिकार के जन आंदोलन की कहानी 'The RTI Story: Power to the People' पुस्तक का विमोचन

सूचना के अधिकार के जन आंदोलन की कहानी 'The RTI Story: Power to the People' नामक पुस्तक का विमोचन ब्यावर के चांग गेट कुमारानन्द सर्किल पर दिनांक 6 अप्रेल 2018 को संपन्न हुआ. मजदूर किसान शक्ति संगठन और रोली बुक्स द्वारा आयोजित विमोचन समारोह में मैग्सेसे पुरस्कार विजेता और मजदूर किसान शक्ति संगठन की श्रीमती अरुणा रॉय द्वारा लिखित पुस्तक 'The RTI Story: Power to the People' का विमोचन हुआ. कार्यक्रम के मुख्य अतिथि दैनिक नवज्योति के प्रधान सम्पादक दीनबंधु चौधरी थे. कार्यक्रम में निखिल डे और रोली बुक्स की एडिटर इन चीफ प्रिया समारोह में अतिथि थे. कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए मुख्य अतिथि चौधरी ने कहा कि अरुणा रॉय ने आम जन के साथ मिलकर जो संघर्ष किया वो काबिले तारीफ़ है. इस संघर्ष की वजह से ही देश को आरटीआई जैसा मजबूत कानून मिला. ऐसा आंदोलन करना और कानून बनवाना निश्चित रूप से मुश्किल काम था. आरटीआई सरकारी तंत्र में फैले भ्रष्टाचार का खात्मा कर गैर कानूनी आय के स्रोतों पर अंकुश लगाता है. आरटीआई का ही डर है कि अधिकारी घोटाले करने और कोई भी गलत काम करने से कतराने लगे हैं. मुख्य अतिथि ने कहा कि आरटीआई कानून तो बन गया है लेकिन उसमें सुधार के लिए अभी भी एक आंदोलन की जरुरत है. आरटीआई आंदोलन की जनक अरुणा रॉय ने कहा कि यह पुस्तक उनके द्वारा नहीं लिखी गयी है. वह लेखक नहीं, केवल संकलकर्ता हैं. उन्होंने कहा कि ब्यावरवासियों सहित मजदूर किसान शक्ति संगठन से जुड़े अनेक लोगों ने आंदोलन के समय और आंदोलन के बाद भी पूरा सहयोग प्रदान किया. समारोह में वक्ताओं ने कहा कि यह वह पुस्तक है जो आने वाली पीढ़ी को आंदोलन की जानकारी देगी और उनका मार्गदर्शन करेगी. कार्यक्रम में आंदोलन से जुड़े अजमेर से डीे एल त्रिपाठी, ओ. पी. रे, मजदूर किसान शक्ति संगठन के शंकरसिंह, नौरती, ग्यारसी, ओम महावर, रामप्रसाद कुमावत, अशोक सेन, आदि गणमान्य लोग उपस्थित थे.

इस पुस्तक को लिखने में कई साल लगे. यह पुस्तक ऐतिहासिक जानकारी से भरपूर है. पुराने दस्तावेजों अभिलेखों को व्यवस्थित करना, धूल भरी सामग्री के ढेर में से जरूरी दस्तावेजों को ढूंढना, पुराने विडियो और फोटो को खंगालना, यह एक बड़ा काम था. यह पुस्तक नागरिकों और राज्य के बीच सत्ता परिवर्तन के लिये कानून लाने की लोगों की एक लंबी लड़ाई की कहानी है. साझे संघर्ष को रेखांकित करने के लिये यह पुस्तक एक प्रयास है. यह पुस्तक सूचना के अधिकार संघर्ष के इतिहास की जानकारी प्रदान करती है. सूचना के अधिकार के भविष्य के चिंतन के लिए यह पुस्तक एक सन्दर्भ ग्रन्थ है.

पुस्तक के विमोचन से पूर्व मजदूर किसान शक्ति संगठन द्वारा एक जन-चेतना रैली ब्यावर के मुख्य बाजारों से निकाली गयी. अपने उद्बोधन में श्रीमती अरुणा रॉय ने उनसे जुड़े और ब्यावर शहर के सभी नागरिकों का आभार व्यक्त किया, जिन्होंने सूचना के अधिकार आंदोलन को सफल बनाने में अपना सहयोग दिया.

सूचना के अधिकार से सम्बंधित आंदोलन एक ऐसा अभियान रहा जो समय के साथ एक बहुत ही शानदार जीवंत जन-आंदोलन के रूप में विकसित हुआ.

रोली बुक्स द्वारा प्रकाशित यह पुस्तक अंग्रेजी में है और शीघ्र इसका हिंदी संस्करण भी प्रकाशित होगा.

अंग्रेजी में लिखी पुस्तक पर अधिक जानकारी के लिए कृपया रोली बुक्स की वेबसाईट पर इस लिंक को क्लिक करें.

- केशव राम सिंघल

Wednesday, February 7, 2018

Time Limit to get the information


Time Limit to get the information

Time limit to get the information is as under:
- 30 days from the date of application
- 48 hours for information concerning t to Assistanhe life and liberty of a person
- 5 days shall be added to the above response time, in case the application for information is given to Assistant Public Information Officer.
- If interest of a third party are involved then time limit will be 40 days (maximum period + time given to the party to make representation).

Failure to provide information within the specified period is a deemed refusal.

In short, we can say that the time limit for getting a response to your RTI inquiry, from the concerned Public Information Officer (PIO) is generally 30 days, from the date your application is submitted. In a case where the application is submitted to the Assistant PIO, five additional days are allowed.

Friday, January 5, 2018

सूचना का अधिकार कानून की अनुपालना - मंत्री कार्यालयों में लोक सूचना अधिकारी नहीं


*सूचना का अधिकार कानून की अनुपालना - मंत्री कार्यालयों में लोक सूचना अधिकारी नहीं*

यह अत्यंत दुःखद स्थिति है कि कानून बनने के बारह साल बाद भी मंत्री कार्यालयों में लोक सूचना अधिकारी नहीं हैं. इस सन्दर्भ में दैनिक भास्कर ने अपनी रिपोर्ट छापी है, जिसे देखें.


साभार - दैनिक भास्कर 05 जनवरी 2018

देश में पारदर्शी प्रशासन देने और आम आदमी को सरकारी योजनाओं और कार्यक्रमों के बारे में जानने और सूचना पाने का अधिकार देने के लिए करीब बारह साल पहले संसद ने 'सूचना का अधिकार' कानून पारित किया था, उसकी क्रियान्विति इन दिनों बुरे दौर से गुजर रही है. आज हालात ऐसे हैं कि 'सूचना का अधिकार' कानून के अंतर्गत बार-बार सूचनाएं माँगने पर भी सरकारी विभागों से सूचनाएं नहीं मिल पाती हैं या संबंधित अधिकारी आधी-अधूरी सूचनाएं दे देते हैं. राज्यों के सूचना आयोगों में पर्याप्त संख्या में कर्मचारी नहीं हैं और राज्य सरकारें इस कानून की क्रियान्विति के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध नहीं करती हैं.

इस कानून की पालना आज चिंता की बात है.

- केशव राम सिंघल


Wednesday, November 22, 2017

CIC has declared IBA as Public Authority under RTI Act, 2005


CIC has declared IBA as Public Authority under RTI Act, 2005

Central Information Commissioner (CIC) has declared Indian Banks’ Association (IBA) as Public Authority under RTI Act, 2005. IBA has been asked to appoint CPIO under the act within 30 days. Indian Banks' Association is public authority under RTI, rules Full Bench of CIC.
In a landmark decision, a Full Bench of the Central Information Commission (CIC) has declared Indian Banks' Association (IBA) as public authority under the Right to Information (RTI) Act. Asking the IBA to appoint a public information officer (PIO), the CIC has directed the Association to provide desired information to the applicant within 30 days.

The Commission was hearing case of RK Jain and Ita Bose against IBA, an association of Indian banks and financial institutions. Citing Section 2(h) of the RTI Act, the IBA had refused to provide information stating that it is not a public authority. Earlier on 20 October 2017, M Sridhar Acharyulu, Central Information Commissioner, had declared IBA as public authority.

The CIC observed that IBA performs important role in decision making process of banking industry.

It is a very good decision that will provide rights to citizens to get information from IBA under the RTI Act.

- Keshav Ram Singhal



Monday, November 6, 2017

'सूचना का अधिकार' कानून का कार्यान्वयन


'सूचना का अधिकार' कानून का कार्यान्वयन


देश में पारदर्शी प्रशासन देने और आम आदमी को सरकारी योजनाओं और कार्यक्रमों के बारे में जानने और सूचना पाने का अधिकार देने के लिए करीब बारह साल पहले संसद ने 'सूचना का अधिकार' कानून पारित किया था, उसकी क्रियान्विति इन दिनों बुरे दौर से गुजर रही है. आज हालात ऐसे हैं कि 'सूचना का अधिकार' कानून के अंतर्गत बार-बार सूचनाएं माँगने पर भी सरकारी विभागों से सूचनाएं नहीं मिल पाती हैं या संबंधित अधिकारी आधी-अधूरी सूचनाएं दे देते हैं. राज्यों के सूचना आयोगों में पर्याप्त संख्या में कर्मचारी नहीं हैं और राज्य सरकारें इस कानून की क्रियान्विति के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध नहीं करती हैं.



'सूचना का अधिकार' कानून एक बहुत बड़ी पहल थी. इस कानून के लागू होने के बाद अनेक अनियमितताएं और भ्रष्टाचार उजागर हुए.

इस कानून की पालना आज चिंता की बात है. इस सम्बन्ध में जरूरी है कि इस कानून की पालना के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराएं जाए, ताकि प्रशासन पारदर्शी और संवेदनशील बन सके.

- केशव राम सिंघल

Thursday, October 20, 2016

अफगानी प्रतिनिधि दल ने 'सूचना के अधिकार' (Right to Information) पर अजमेर में किया संवाद


अफगानी प्रतिनिधि दल ने 'सूचना के अधिकार' (Right to Information) पर अजमेर में किया संवाद

अजमेर, 20 अक्टूबर, 2016


अफगानिस्तान सरकार के 12 सदस्य दल ने आज अजमेर का दौरा किया तथा अजमेर के जन संगठनों के कार्यकर्ताओं से भेंट कर सूचना के अधिकार पर संवाद स्थापित किया. पी.यू.सी.एल.(People's Union for Civil Liberties) की ओर से समीक्षा परिसर में आयोजित कार्यक्रम में भारत में सूचना के अधिकार कानून के प्रारूप तथा उसकी क्रियान्विति की स्थिति पर चर्चा की गई. पी.यू.सी.एल. के राज्य उपाध्यक्ष डी.एल. त्रिपाठी ने अफगानी प्रतिनिधि मण्डल का स्वागत करते हुए सूचना के अधिकार कानून के प्रावधानों की विस्तार से जानकारी दी. राज्य महासचिव डॉ. अनन्त भटनागर ने सूचना के अधिकार कानून के क्षेत्र में जन भागीदारी की जानकारी दी तथा भारत में सफलता के उदाहरण बतलाए. केशव राम सिंघल ने कहा कि भारत में प्रशासन के कुछ लोग जो पारदर्शिता नहीं चाहते, वे सूचना के अधिकार की पालना नहीं करते या गुपचुप तरीके से विरोध करते है, पर अच्छी बात यह है कि भारत की न्याय व्यवस्था ने अपने फैसलों से सूचना के अधिकार को संबल दिया है. सूचना के अधिकार से प्रशासनिक कार्यों में पारदर्शिता आती है.



अफगानिस्तान प्रतिनिधि दल के अध्यक्ष सैयद इकराम अफजाली ने बताया कि अफगानिस्तान में भी भारत से प्रेरणा लेकर सूचना का अधिकार कानून बनाया गया है, किन्तु अभी वह शुरूआती दौर में है. उन्होंने कहा कि भारत में जनता द्वारा संघर्ष कर यह कानून प्राप्त हुआ है, इस कारण जनता इसका उपयोग कर रही है. अफगानिस्तान में यह कानून सरकार द्वारा दिया गया है, इस कारण जनता इसका उपयोग कम कर रही है. अफगानिस्तान प्रतिनिधि दल का भारत यात्रा का उद्देश्य यहॉ के सूचना के अधिकार को लागू किये जाने से आ रहे बदलाव को जानना तथा इसके क्रियान्वयन में आ रही बाधाओं को समझना है.



प्रतिनिधि दल ने चर्चा करते हुए प्रशासन के कार्यों में पारदर्शिता लाने व जबाबदेही के लिए सूचना के अधिकार को कारगर बताते हुए इसकी जरूरत पर बल दिया. प्रतिनिधि मण्डल में आठ प्रतिनिधि कमिशनर - अज़ीज फैज़ी, अब्दुल शौकोर, नाज़ीबा, होवा अलाम नूरिस्तानी, नूर वली खान, हामिद फ़ैजली, अहमद जमशेद अमीरी, दानिश कारोखेल व तीन सदस्यगण - एनुद्दीन, वाहुल्ला मिशबाह व साफिउल्लाह शामिल थे. चर्चा में शकील अहमद , सिस्टर अलवीना, राधावल्लभ शर्मा, अन्जू नयाल ने भी अपने विचार रखे. पी.यू.सी.एल. जिलाध्यक्ष ओ.पी. रे ने सभी अफगानी अतिथियों का भारत आगमन पर धन्यवाद ज्ञापित किया. प्रतिनिधि मण्डल ने बैठक पश्चात ख्वाजा साहब की दरगाह में जियारत की. शेखजदा जुल्फीकार चिश्ती ने उन्हें जियारत कराई व दस्तारबन्दी की.







Friday, May 27, 2016

ब्यावर (अजमेर,राजस्थान) में लगा सूचना के अधिकार का शिलालेख


ब्यावर (अजमेर,राजस्थान) में लगा सूचना के अधिकार का शिलालेख: साधारण लोगों के योगदान को किया याद
ब्यावर (अजमेर, राजस्थान) 26 मई, 2016

मैं वे 40 दिन कभी नहीं भूल सकता हूँ जब हम चांग गेट पर धरने पर बैठे थे और इसका एक एक क्षण मैं अपने कैमरे में कैद कर रहा था, तब मैंने यह सपने में भी नहीं सोचा था कि हम इतिहास बना रहे हैं. यह कहना है अशोक सेन का जो ब्यावर के मशहूर फोटोग्राफर एवं सामाजिक कार्यकर्त्ता हैं. वे ऐसे अकेले कार्यकर्त्ता नहीं हैं जो इस ऐतिहासिक धरना जो 6 अप्रेल 1996 को ब्यावर के चांग गेट पर मजदूर किसान शक्ति संगठन (MKSS) की ओर लगाया गया था. गुरूवार को सैकड़ों की तादाद में ब्यावर शहर के नागरिक और आस-पास के लोगों ने इस शिलालेख के लगाये जाने पर के मौके पर धरने की विभिन्न यादों को ताज़ा किया. ब्यावर में लगाया गया यह शिलालेख देश का पहला ऐसा शिलालेख है जो सूचना के अधिकार के लिए हुए जन संघर्ष की याद में लगया गया है.

मजदूर किसान शक्ति संगठन मजदूरों और सीमान्त किसानों का एक संगठन है जिसकी स्थापना 1 मई 1990 को भीम के पाटिया के चौड़ा में की गई थी जिसका मुख्य कार्यलय राजसमन्द जले के एक छोटे से गाँव देवडूंगरी में है. यह संगठन मजदूरों के न्यूनतम मजदूरी के मुद्दे, जमीन, वन अधिकार आदि के मुद्दे पर संघर्षरत है. इसी संगठन की ओर से 6 अप्रेल 1996 को ब्यावर के चांग गेट पर धरना लगाया जिसके बारे में प्रसिद्द पत्रकार कुलदीप नैयर ने कहा कि यह आन्दोलन देश में पारदर्शिता, जवाबदेही और भागीदारीपूर्ण लोकतंत्र के लिए एक मिशाल बन गया.

धरने की बजह से ना केवल राजस्थान सरकार को सूचना का अधिकार कानून 2000 पास करना पड़ा बल्कि इसकी बजह से सूचना के जन अधिकार का राष्ट्रीय अभियान बना जिसने केंद्र सरकार पर सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 बनाये और लागू किये जाने के लिए दवाब बनाया.

इस यादगार कार्यक्रम में सिक्किम उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एस.एन. भार्गव, शंकर सिंह रावत रजस्थान विधानसभा के सदस्य (MLA), ब्यावर नगर परिषद् सभापति एवं उप सभापति, डी.एल. त्रिपाठी, अनंत भटनागर एवं अन्य बहुत प्रबुद्ध नागरिक मौजूद थे. यह उल्लेखनीय है कि इस शिलालेख का शिलान्यास भारत के प्रथम मुख्य सूचना आयुक्त माननीय वजाहत हबीबुल्लाह द्वारा सूचना के अधिकार के 10 वर्ष पूरे होने पर 13 अक्टूवर, 2015 को किया था.

इस अवसर पर पीयूसीएल की राजस्थान प्रदेश की अध्यक्ष एवं धरने में पूरा समय बिताने वाली कविता श्रीवास्तव ने कहा कि सूचना के अधिकार के 6 अप्रेल, 1996 को शुरू हुए इस धरने में सब्जी बेचने वालों ने हमें मुफ्त में सब्जी उपलब्ध करवाई, धर्मशाला वालों ने सामान रखने के लिए धर्मशाला के कमरे खोले, शहर के व्यापारियों ने हमें दिल से समर्थन दिया और यहाँ के प्रबुद्ध नागरिक और पत्रकार हमारे साथ हमेशा खड़े रहे. ऐसा लगता था कि इस सूचना के अधिकार कानून के लिए पूरा ब्यावर शहर हमारे परिवार की तरह हो गया था.

प्रमुख सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्त्ता एवं मजदूर किसान शक्ति संगठन के संस्थापकों में से एक ने कहा कि “ भारत में पास किया गया सूचना का धिकार कानून सबसे अलग है क्योंकि यह इस देश के गरीबों, वंचितों, किसानों और मजदूरों के द्वारा लाया गया कानून है ना कि अकादमिक, पत्रकार और बुद्धिमान लोगों द्वारा.” उन्होंने कहा कि ऐसे समय में जब सूचना के अधिकार पर बार-बार हमले किये जा रहे हों और इसे बदलने की चेष्टाएँ की जा रहीं हों तब साधारण लोगों की भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाती है. उन्होंने कहा कि यह एकमात्र कानून है जो साधारण जनता के संघर्ष से बना और उनके द्वारा इस्तेमाल किया जाता है, इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है प्रत्येक वर्ष लगभग 60 लाख लोग सूचना के अधिकार का प्रयोग करते हैं.

सिक्किम उच्च न्यायलय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एस.एन. भार्गव ने लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि 1996 में इस ऐतिहासिक धरने का हिस्सा नहीं होने का उन्हें मलाल है लेकिन उस समय वे सिक्किम उच्च न्यायलय में मुख्य न्यायाधीश थे इसलिए इसमें भाग नहीं ले सके. लेकिन उन्होंने कहा कि अब वे इस पारदर्शिता, जवाबदेही और भागीदारीपूर्ण लोकतंत्र के आन्दोलन के लिए जो भी कर सकते हैं जरुर करेंगे . उन्होंने कहा कि यह ब्यावर शहर के लिए गर्व की बात है कि इस प्रकार का शिलालेख ब्यावर में लगाया गया है जो देश के लाखों लोगों को अपने अधिकारों के लिए लड़ने की प्रेरणा देगा.

बहुत लोग जो इस कार्यक्रम में नहीं आ पाए लेकिन 1996 के धरने में भागीदार थे उन्होंने अपने सन्देश भेजे जिन्हें इस आयोजन के दौरान पढ़कर सुनाया गया “मुझे अभी भी धरने में शामिल होना याद है. जो लौ इस धरने के द्वारा जलाई गई थी वह सरकार में पारदर्शिता के राष्ट्रीय आन्दोलन के रूप में उभरी. सूचना का अधिकार समाज के किसी एक वर्ग के लिए ही उपयोगी नहीं है यह समाज के सभी तबकों के लिए कारगर है. यही वो अधिकार है जो संविधान और उसके मूल्यों को जिन्दा रखता है.. कुलदीप नैयर, एक पत्रकार, लेखक, और मानवाधिकार कार्यकर्त्ता का यह सन्देश पढ़ा गया.
विकास अध्ययन संस्थान जयपुर के पूर्व निदेशक प्रोफेसर वी.एस. व्यास का यह सन्देश पढ़ा गया “सूचना का अधिकार भारतीय लोकतंत्र के परिपक्व होने की निशानी है, इस महत्वपूर्ण अधिकार के लिए लोगों का सामूहिक प्रयास उनके लोकतान्त्रिक मूल्यों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को जाहिर करता है.”

राजस्थान उच्च न्यायलय के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस दवे ने भी एक सन्देश भेजा जिसमें उन्होंने कहा कि: “मैं हमेशा आपके साथ हूँ.. ऐसे साधारण लाखों लोग जो अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए हर रोज़ भय के इस माहौल में लड़ते हैं और इज्जत के साथ जीना चाहते हैं. मैं इस कार्यक्रम की सफलता की कामना करता हूँ और इस आन्दोलन के साथ हूँ.”

एक तरफ तो ब्यावर के स्थानीय नागरिक यह गर्व महसूस कर रहे हैं कि इस शहर ने पूरे देश के लिए सूचना के अधिकार जैसा कानून दिया वहीँ दूसरी तरफ राजस्थान सरकार ने अपनी कुछ पाठ्य पुस्तकों से वे अंश हटा दिए हैं जिनमें यह वर्णित था कि- किस प्रकार मजदूर किसान शक्ति संगठन और अन्य संगठनों की मदद से सूचना के अधिकार का आन्दोलन ने जन्म लिया और इस देश को सूचना का अधिकार कानून दिया. इस कार्यक्रम के दौरान यह प्रस्ताव सर्वसम्मति से पास हुआ कि RTI, MKSS और ब्यावर (राजस्थान) के योगदान का जो हिस्सा हटा दिया गया है उसे वापस जोड़ा जाये.

(साभार - मज़दूर किसान शक्ति संगठन की प्रेस विज्ञप्ति)

Memorial on the RTI struggle unveiled in Beawar (Rajasthan)



Memorial on the RTI struggle unveiled in Beawar: People lay claim to their Right to Information
The memorial, dedicated to the RTI, perhaps one of its kind in the entire country


Citizens from all walks of life come together to commemorate the historic dharna for RTI organised by the MKSS in 1996

26.05.2016
Beawar (Ajmer Dist., Rajasthan)

“I can never forget those forty days when we sat on a dharna here at Chang Gate. I was documenting every moment of that dharna through my camera without a clue that we were making history and I was destined to document it,” said Ashok Sain, a well-known photographer and activist from Beawar. Ashok was not the only one who was busy reminiscing the dharna organised by Mazdoor Kisan Shakti Sangathan (MKSS) in April-May 1996 demanding a Right to Information (RTI) law when something like this was unheard of. Joining him on Thursday were hundreds of citizens from Beawar and nearby areas who had all gathered here on the occasion of the unveiling ceremony of a memorial dedicated to the Right to Information, perhaps the only of its kind in the entire country.

It is worth noting that MKSS, a collective of peasants and labourers, headquartered in a nondescript village in Rajsamand district, had been waging struggles for peoples’ rights related with land, minimum wages, forest rights, etc. since it came into existence in 1990. Starting from 6th April 1996, the Sangathan organised a dharna at Chang Gate in Beawar. The dharna lasted for forty days and to use eminent journalist Kuldip Nayar’s words ‘became the trigger that later went on to become a peoples’ movement for transparency, accountability and participatory democracy in the country’.

The 1996 dharna was seminal as it not only forced the Rajasthan government to pass the Rajasthan Right to Information Act, 2000 but also led to the formation of the National Campaign for Peoples’ Right to Information (NCPRI), a national movement which compelled the national government to enact the Right to Information Act in 2005.

On Thursday, amidst songs of solidarity and reminiscence of memories, a memorial dedicated to this struggle and the Right to Information was unveiled by Mr. Justice S. N. Bhargava, the former Chief Justice of the Sikkim High Court. Shankar Singh Rawat (Member of the Legislative Assembly), Chairperson and Deputy Chairperson of the Beawar Nagar Parishad, D.L. Tripathi and Anant Bhatnagar from the Peoples’ Union for Civil Liberties (PUCL) and several eminent citizens of Beawar were present on the occasion.

Speaking on the occasion, Kavita Srivastava of the PUCL, who was one of the participants of the dharna throughout the forty days, said, “Everybody became a part of our dharna. Be it the vegetable vendors who provided free vegetables to us or the owners of the dharmshala who gave us rooms or the traders who supported us wholeheartedly or the lawyers and journalists who stood by us. It was as if the entire city had become our family and a patron to our cause.”

Prominent socio-political activist and one of the founders of the MKSS, Aruna Roy said, “India’s Right to Information law is unique as it was brought to pass by poor peasants, farmers and labourers and not by politicians, academics, journalists or the intelligentsia.” Highlighting the attempts to dilute the Right to Information by successive governments and attacks on those using RTI to unearth corruption and wrongdoing, she said that it has become more important today to prolong our efforts at protecting and strengthening this significant right as it is the crucial link between the citizens and those who govern us. She said that the RTI is the only law that is owned by the people of the country and more than sixty lakh RTI applications that are received by public authorities across the country bear testimony to this fact.

Addressing the gathering, Chief Guest of the occasion and former Chief Justice of the Sikkim High Court, Justice S. N. Bhargava said, “I really regret not being a part of the dharna and the (later) movement back then as I was working in Sikkim and elsewhere during that period. I do realise that I have really missed a historic opportunity, but now I want to do everything in my capacity to further this movement for transparency, accountability and participatory democracy.” He said that it was befitting and a matter of pride for the city of Beawar that such a memorial has been constructed here that will give inspiration to millions in the country to fight for their rights.

Apart from the many people who attended the event, messages from several others who came and supported the 1996 dharna and the RTI movement were also read out during the celebrations. “...I still remember my visit to the dharna. The spark that was started by the dharna has turned into a national movement for transparency in governance. Right to Information is not only useful for a certain section of society but for every person of the society. It is a right that keeps the Constitution and its values alive...” read the statement from Kuldip Nayar, veteran journalist, author and human rights activist.

A message from Prof. V. S. Vyas, former director of the Institute of Development Studies, Jaipur, read - “...The Right to Information is a sign of the maturity of the Indian democracy. Through their collective struggles for this important right, citizens of India have shown their commitment to democratic values.”

Former judge of the Rajasthan High Court, Justice V. S. Dave also sent a message that said, “...I am always with you...to fight for the cause of teeming millions who dread the dawn and the dusk as they are far away from having basic needs and to be termed as 'We, The People of India' enjoying right to live with dignity. I wish the function all success and assure my solidarity for the noble cause...”

It is ironic that on one hand the people of Beawar (and Rajasthan) take pride in their struggle that led to the evolution of the RTI law in the country, on the other hand, portions that mention the evolution of the Right to Information in India and contribution of the MKSS and other organisations and individuals, have recently been removed from the Rajasthan State Board text-books. A resolution was passed by all those present to demand the restoring of the RTI and contribution of the people of Beawar and Rajasthan in the Rajasthan State Board text-books.

Pictures -

1. The Memorial at Chang Gate.


2. Citizens of Beawar gathered during the occasion.



3. and 4. - Justice S.N. Bhargava, Aruna Roy, Kavita Srivastava and others present on the occasion.


5. Justice S.N. Bhargava giving his presidential address.

(Courtesy Source - Press News Release from MKSS Rajasthan)

Monday, January 25, 2016

सूचना के अधिकार (RTI) से संबंधित कुछ संक्षिप्त जानकारी


सूचना के अधिकार (RTI) से संबंधित कुछ संक्षिप्त जानकारी

RTI मलतब है 'Right to information' अर्थात 'सूचना का अधिकार' - यह कानून हमारे देश में 2005 में लागू हुआ।

'Right to information' अर्थात 'सूचना का अधिकार' का उपयोग करके आप सरकार और सरकार के किसी भी विभाग से सूचना मांग सकते है। आमतौर पर लोगो को इतना ही पता होता है। परंतु इस के बारे में कुछ और रोचक जानकारी निम्न है -

- 'Right to information' अर्थात 'सूचना का अधिकार' से आप सरकार से कोई भी सवाल पूछकर सूचना ले सकते है।
- 'Right to information' अर्थात 'सूचना का अधिकार' से आप सरकार के किसी भी दस्तावेज़ की जांच कर सकते है।
- 'Right to information' अर्थात 'सूचना का अधिकार' से आप दस्तावेज़ की प्रमाणित कापी ले सकते है।
- 'Right to information' अर्थात 'सूचना का अधिकार' से आप सरकारी कामकाज में इस्तेमाल सामग्री का नमूना ले सकते है।
- 'Right to information' अर्थात 'सूचना का अधिकार' से आप किसी भी कामकाज का निरीक्षण कर सकते हैं।

'Right to information' अर्थात 'सूचना का अधिकार' कानून की निम्न धाराएँ हमारे काम की है -

- 'Right to information' अर्थात 'सूचना का अधिकार' की धारा 6 (1) - RTI का आवेदन लिखने का धारा है।
- 'Right to information' अर्थात 'सूचना का अधिकार' की धारा 6 (3) - अगर आपका आवेदन गलत विभाग में चला गया है, तो वह विभाग आपके आवेदन को 6 (3) धारा के अंतर्गत सही विभाग मे 5 दिन के अंदर भेज देगा।
- 'Right to information' अर्थात 'सूचना का अधिकार' की धारा 7(5) - इस धारा के अनुसार BPL कार्ड वालों को कोई आरटीआई शुल्क नही देना होता।
- 'Right to information' अर्थात 'सूचना का अधिकार' की धारा 7 (6) - इस धारा के अनुसार अगर आरटीआई का जवाब 30 दिन में नहीं आता है तो सूचना निशुल्क में दी जाएगी।
- 'Right to information' अर्थात 'सूचना का अधिकार' की धारा 18 - अगर कोई अधिकारी जवाब नही देता तो उसकी शिकायत सूचना अधिकारी को दी जाए।
- 'Right to information' अर्थात 'सूचना का अधिकार' की धारा 8 - इस के अनुसार वो सूचना RTI में नहीं दी जाएगी जो देश की अखंडता और सुरक्षा के लिए खतरा हो या विभाग की आंतरिक जांच को प्रभावित करती हो।
- 'Right to information' अर्थात 'सूचना का अधिकार' की धारा 19 (1) - अगर आपके RTI आवेदन का जवाब 30 दिन में नहीं आता है, तो इस धारा के अनुसार आप प्रथम अपील अधिकारी को प्रथम अपील कर सकते हैं।
- 'Right to information' अर्थात 'सूचना का अधिकार' की धारा 19 (3) - अगर आपकी प्रथम अपील का भी जवाब नही आता है तो आप इस धारा की मदद से 90 दिन के अंदर दूसरे अपील अधिकारी को अपील कर सकते हैं।

'Right to information' अर्थात 'सूचना का अधिकार' का आवेदन कैसे लिखे?

इसके लिए आप एक सादा पेपर लें और उसमे 1 इंच की कोने से जगह छोड़े और नीचे दिए गए प्रारूप में अपने RTI का आवेदन लिख लें
...................................
सूचना का अधिकार 2005 की धारा 6(1) और 6(3) के अंतर्गत आवेदन।
सेवा में,
(अधिकारी का पद)/
जनसूचना अधिकारी
विभाग का नाम.............
विषय - RTI Act 2005 के अंतर्गत .................. से संबधित सूचनाऐं।
अपने सवाल यहाँ लिखें।

1-..............................
2-...............................
3-..............................
4-..............................

मैं आवेदन फीस के रूप में 10रू का पोस्टलऑर्डर ........ संख्या अलग से जमा कर रहा /रही हूं।
या
मैं बी.पी.एल. कार्डधारी हूं। इसलिए सभी देय शुल्कों से मुक्त हूं। मेरा बी.पी.एल.कार्ड नं..............है।
यदि मांगी गई सूचना आपके विभाग/कार्यालय से सम्बंधित
नहीं हो तो सूचना का अधिकार अधिनियम,2005 की धारा 6 (3) का संज्ञान लेते हुए मेरा आवेदन सम्बंधित लोकसूचना अधिकारी को पांच दिनों के समयावधि के अन्तर्गत हस्तान्तरित करें। साथ ही अधिनियम के प्रावधानों के तहत
सूचना उपलब्ध् कराते समय प्रथम अपील अधिकारी का नाम व पता अवश्य बतायें।
भवदीय
नाम:....................
पता:.....................
फोन नं:..................
हस्ताक्षर...................
ये सब लिखने के बाद अपने हस्ताक्षर कर दें।

कुछ और जानकारियाँ -
- केंद्र से सूचना मांगने के लिए आप 10 रु देते है और एक पेपर की कॉपी मांगने के 2 रु देते है।
- हर राज्य का RTI शुल्क अगल अलग है जिस का पता आप कर सकते हैं।

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'Right to information' अर्थात 'सूचना का अधिकार' का सदप्रयोग करें।

(संकलित जानकारी)

Tuesday, October 13, 2015

सूचना के अधिकार पर एक विशेष कार्यक्रम




- केशव राम सिंघल

सूचना के अधिकार लागू होने के एक दशक पूर्ण होने के अवसर पर पीयूसीएल के तत्वावधान में एक विशेष कार्यक्रम 13 अक्टूबर 2015 को दुपहर दो बजे सोफिया कॉलेज अजमेर में आयोजित किया गया, जिसमे मुख्य वक्ता पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त श्री वज़ाहत हबीबुल्ला एवं एमकेएसएस की श्रीमती अरुणा रॉय थी. कार्यक्रम का संचालन सोफ़िया कालेज की प्राध्यापिकाओ और छात्राओं द्वारा किया गया. सोफ़िया कॉलेज की उप प्राचार्या सिस्टर पर्ल ने अतिथियों का स्वागत किया.

श्रीमती अरुणा रॉय ने सूचना के अधिकार के ऐतिहासिक पहलूओं और इसकी उपयोगिता पर प्रकाश डाला. उन्होंने कहा कि यह गौरव की बात है कि सूचना के अधिकार कानून की बुनियाद अजमेर में रखी गई थी, इसी जिले से इस कानून की माँग का संघर्ष प्रारंभ हुआ था. यह कानून आज देश का सबसे चर्चित कानून है. उन्होंने छात्राओं से कहा कि 'हमारा पैसा हमारा हिसाब' के आधार पर जनता ही सरकारी धन की मालिक है. उन्होंने देश में 44 व्हिसल ब्लोअर्स की हत्या को शर्मनाक बताते हुए व्हिसल ब्लोअर्स की सुरक्षा के लिए सशक्त कानून बनाए जाने की आवश्यकता बताई. साथ ही उन्होंने बढ़ते निजीकरण, हिंसा और सांप्रदायिक उन्माद से सचेत रहने का आव्हान किया.

राधिका गणेशन ने चेतना गीत 'ये देश हमारे आप का' प्रस्तुत कर एक नए जोश का भाव पैदा किया. हरमाडा पंचायत की पूर्व सरपंच नौरती देवी ने अपने अनुभव साझा किए तथा हर स्तर पर जागरूक रहने की आवश्यकता बताई.

पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त श्री वज़ाहत हबीबुल्ला ने सूचना के अधिकार अधिनियम की कुछ धाराओं को स्पष्टता से समझाया और कहा कि प्रजातंत्र में सूचना का अधिकार बहुत जरूरी है. यह सुशासन का एक माध्यम है. यह प्रजातंत्र में पब्लिक पार्टिर्सिपेशन को बढ़ावा देता है. यह काम में पारदर्शिता लाकर काम को आसान करता है. उन्होंने कहा कि सूचना के अधिकार से प्रशासनिक कार्यप्रणाली में सुधार, सशक्तता व जवाबदेही सुदृड़ हुई है. साथ ही उन्होंने कहा कि कुछ लोग इस कानून को प्रशासनिक कार्यों में बाधा मानते हैं, वे अपने ग़लत मनसूबे पूरे नहीं होने या लापरवाही उजागर होने के कारण दु:खी हैं. लोकतंत्र की बुनियाद प्रशासनिक पारदर्शिता पर टिकी है. इस अधिकार से जनता को अपना वास्तविक हक मिला है.

कार्यक्रम में पीयूसीएल राज्य उपाध्यक्ष डी. एल. त्रिपाठी ने भी अपने विचार रखे. दैंनिक नवज्योति के प्रधान संपादक दीनबंधु चौधरी ने अपने विचार रखते हुए कहा कि सरकारी पालिसी में जनता की सहभागिता आवश्यक है.

कार्यक्रम में निखिल डे, पीयूसीएल राज्य महासचिव डा. अनंत भटनागर, पीयूसीएल अजमेर अध्यक्ष ओ. पी. रे, पीयूसीएल अजमेर सचिव कैरोल गीता, राज कुमार नाहर, कालिंद नंदिनी शर्मा, प्रिंस सलीम, केशव राम सिंघल आदि नागरिक भी उपस्थित थे. कार्यक्रम के दौरान श्रोता छात्राओं ने प्रश्न पूछें. जिनका समाधान मुख्य वक्ताओं ने किया. कार्यक्रम के संचालन में इतिहास विभाग की प्रवक्ता आदिला ने अपनी सहभागिता निभाई.

कार्यक्रम के आयोजन के लिए पीयूसीएल के पदाधिकारियों को धन्यवाद और बधाई.

Monday, July 27, 2015

NCRB will collect data on attacks on journalists, whistle-blowers and RTI activists



The Business Standard reports, "The National Crime Records Bureau (NCRB), for the first time, will begin collecting data from across the country on attacks on Right to Information (RTI) activists, journalists, social activists and whistleblowers." It also reports, "But the manner in which the data is being collected is likely to lead to under-reporting of the cases in the government database."

In this regard, NCRB has circulated a new template to the states, to collect data from police stations.

News report in this regard can be seen in the Business Standard dated 23 July 2015.